Shri Kathopnishad:Ch 1

Discussion in 'Hindu Holy Books' started by Aum, Mar 30, 2015.

  1. Aum

    Aum New Member

    ====NACHEKETAS IN THE HOUSE OF DEATH=====
    “Om Namo Bhagvavate Vasudevayah”

    Kathopnishad is one of the main 10 Upnishads. This upnishad tells about the secret of life and death. The Chapter 1 which contains the conversation between Nachiketa a young wise child who wanted to know what happens after death.

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    उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ।
    तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥

    At the end of his life, desiring Heaven, Vajasravasa (Natcheketas’ father), a pious man, sacrificed a few of his least valuable possessions.

    तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश। सोऽमन्यत॥

    When the gifts (consisting of cows) were being led (to the priests), faith entered him(Natcheketa), who was still a boy; he thought:

    पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरीन्द्रियाः
    अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥
    “These barren cows have yielded all their milk, ate and drunk for the last time. Joyless are the worlds attained by one who offers(give charity) such useless gifts.”

    (Young Nachiketa when saw his father giving barren cowsgiving as gifts to priests, he though these cows are given all the milk and now useless. How these cows are going to make those priests happy. Why not Father gives something valuable as gift. He knew he is the most valuable for his father and so he asked:)

    स होवाच पितरम् – तात कस्मै मां दास्यसि – इति। द्वितीयं तृतीयं। तं होवाच – मृत्यवे त्वा ददामि – इति ॥

    He said, “To whom will you give me, father?”
    At first the father ignored his son but Nacheketas persisted, asking a second and third time,
    “To whom will you give me, father? To whom will you give me?”

    “To Death I give you!” said the father in anger.

    बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः।
    किं स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन् मयाद्य करिष्यति ॥

    Of many I go as the first; of many I go as the middling. What remains for Death (Yama) to be accomplished that to-day through me he will accomplish?

    अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे।
    सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥

    See how kernels of corn fall to the ground, decay, and are later reborn.”“I wonder what Death will work through me?” Nacheketas thought as he set out for the house of Death.

    [Nachiketas went to the abode of Death and he had to wait there for three nights before Death(Yama) returned and could show him hospitality due to a guest]

    तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीत् गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः।
    नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणिष्व॥

    (Yama said): O Brahman, since thou, a venerable guest, hast stayed in my abode three nights without eating, obeisance to thee, O Brahman; may prosperity be to me. Choose three boons (for the three nights of waiting)

    [The first two boons chosen by Nachiketas are not of any philosophical importance. The first was that his father’s anger be appeased. The second was that he might know the nature of the Agni (Fire) which led those who performed sacrifices to heaven. Both these boons were readily granted by Death (Yama). And the boy was asked to choose the third boon.

    येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
    एतद्विद्यामनुषिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः॥

    “When a person dies,” Natcheketas said, “does he or she continue to exist?” Some say we exist after death and others that we don’t. Please tell me the what happens.”

    देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
    अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥

    “On this subject,” Death replied, “even the Gods have their doubts. The self is very subtle and difficult to understand. Don’t press me on this. I’ll give you another boon.”

    देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ।
    वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥

    “This is the only worthwhile question,” said Nacheketas, “and you’re the only one who knows the answer.”

    (Yama tried to convince Nachiketa to ask for some other boon he rather given him lot of options from which he could select)
    शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्।
    भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥

    Yama said: Choose sons and grandsons who would live a hundred years, many cattle, elephants, gold, and horses. Choose the great sovereignty over earth. And you yourself live as many years as you wish to.

    एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च।
    महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥

    If you consider this as an equal boon, choose wealth and long life. O Nachiketas, prosper on this vast earth. I will make these available to you.

    (Yama offers Nachiketa further all wealth and luxury he can wish for.)
    ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छ्न्दतः प्रार्थयस्व।
    इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः।
    आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥

    Whatever desires there are that are difficult to attain in this world of mortals, all those desires you ask ask at your will. Here are lovely maidens, with chariots, with lutes. The likes of them are not to be attained by men. With them bestowed by me, have them all for your disposal. O Nachiketas, but do not ask about death.

    श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः।
    अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥

    Nachiketas said:
    (These may or may not ) last till tomorrow. O Lord, this (which you have offered) wears away the vigour of all the senses of men. Even every kind of life is small indeed. You keep the beautiful
    women and fast chariots[I don’t want these].

    न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष चेत्त्वा।
    जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वम् वरस्तु मे वरणीयः स एव॥

    Man cannot be propitiated with wealth. We will get wealth if we meet thee. We will live as long as thou shalt rule. But that alone is the boon which I can choose.

    अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः कधःस्थः प्रजानन्।
    अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदा- नतिदीर्घे जिविते को रमेत ॥

    Having come to the immortals who never decay, which decaying mortal living on the earth below, (now) knowing, will, thinking on colour, pleasures and enjoyments, delight in the life (that may be) very long?.

    यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्सांपराये महति ब्रूहि नस्तत्।
    योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥

    In respect of which, O Yama, I want to know what people doubt, what happens after death, please tell me that. This boon which penetrates into the hidden, no other than this will Nachiketa chooses.
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    The same story is also found in Mahabharat, people may read the story separately, Here I produce the contents with shlokas and meaning. I'll produce just story in simple language.
     
  2. Aum

    Aum New Member

    =========श्री कठोपनिषद : अध्याय 1.1========
    =========यमराज के दरबार में नचिकेता=======
    “ओम् नमो भगवते वासुदेवायः”

    कठोपनिषद, १० महत्वपूर्ण उपनिषद में से एक है| इस उपनिषद में जन्म, मृत्यु और आत्मा के रहस्यों का वर्णन है | अध्याय १ में नचिकेता का यमराज के दरबार में जाने और उनसे मृत्यु के रहस्यों के बारे में जानने की कथा का वर्णन है|
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    उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ।
    तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥

    जीवन की अंतिम अवस्थामें (वृद्धावस्था में) [नचिकेता के पिता] वजस्रवा ने स्वर्ग प्राप्ति की लालसा से पुन्य कमाने के लिए दानयज्ञ का आयोजन किया|

    तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश। सोऽमन्यत॥

    यज्ञ में [वृद्ध] गायों को दानस्वरूप दान में दिया जाता देखकर बालक नचिकेता के मन में यह विचार उत्पन्न हुए|

    पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरीन्द्रियाः
    अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥

    इन [बूढी] गायों ने जितना खाना था,दूध देना था सब दे दिया और अब किसी उपयोग के नही हैं, फिर इन गायों को दान करके कौन से पुण्य की प्राप्ति होगी?
    (बालक नचिकेता ने जब अपने पिता को बूढी और अनुपयोगी गायों को दान देते देखा तो उसके मन में यह प्रश्न उठा के पिताजी इस प्रकार के अनुपयोगी गायों को दान में देकर कौन सा पुन्य कमा रहे हैं, क्यों नही कोई उपयोगी वस्तु दान में देते हैं? उसने सोचा कि पिताजी के लिए सबसे उपयोगी तो मैं ही हूँ, तब उसमे अपने पिता से कहा)

    स होवाच पितरम् – तात कस्मै मां दास्यसि – इति। द्वितीयं तृतीयं। तं
    होवाच – मृत्यवे त्वा ददामि – इति ॥

    वह बोला, “पिताजी आप मुझे किसको दान में देंगे?” उसने एक बार, दो बार और तीन बार यही प्रश्न पूछा
    आप मुझको किसे दान में देंगे? पिताजी!
    (पहले तो पिता ने उसकी बातों को अनसुनी कर दी, लेकिन बार बार जिद करने पर गुस्से में यह कहा)

    “जा मै तुझे यमराज को दान में देता हूँ!” पिता ने गुस्से में कहा|

    बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः।
    किं स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन् मयाद्य करिष्यति ॥

    कुछ के लिए मै शायद प्रथम हूँ, कुछ के लिए मध्यम(अर्थात यमराज के पास जाने वालो में शायद मैं पहले हूँ या फिर मेरे पहले ही कई लोग वहां गए हों) | मेरे वहां होने से यमराज के औचिया में क्या परिवर्तन होगा?(अर्थात मेरा यमराज के दरबार में क्या महत्व होगा?)

    अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे।
    सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥

    देखो कैसे मकई का एक बीज पृथ्वी पर गिरता है, विलीन होता है और उससे फिर नए पौधे का जन्म होता है | क्या मृत्यु भी ऐसे ही कार्य करती है? यमराज के पास जाते हुए नचिकेता ऐसा विचार कर रहा था|
    [रामलोक पहुँचने पर नचिकेता को तीन रातों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी | तीसरे दिन यमराज जब लौटे तो उन्होंने अपने दरवाजे पर एक अतिथि को देखा और आदर भेंट की]

    तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीत् गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः।
    नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणिष्व॥

    यमराज ने कहा: हे ब्राम्हण! आप एक सम्मानीय अतिथि हैं, आपको
    नमस्कार है | मेरे दरवाजे पर आपको प्रतीक्षा करनी पड़ी, [अपनी त्रुटि को दूर करने के लिए और] आपकी प्रसन्नता के लिए मैं आपको तीन वरदान देता हूँ|

    [पहला वरदान नचिकेता ने माँगा कि “मेरे पिता तो शांति प्राप्त हो”, दूसरा वर माँगा कि मेरे पिता को अग्निदेव की अनुशंषा प्राप्त हो जिससे उनकी स्वर्ग प्राप्ति की कामना पूर्ण हो| यमराज ने दोनों ही वरदान नचिकेता को दिए| यमराज ने तब तीसरा वर मांगने को कहा )

    येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
    एतद्विद्यामनुषिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः॥
    नचिकेता न पूछा: [हे यमदेव!] जब एक जीव की मृत्यु होती है तो क्या जीव का अस्तिस्त्व फिर भी होता है? कुछ लोग कहते हैं हम मृत्यु बाद भी स्थित होते है, कुछ कहते है कि नही | कृपया आप इसका वर्णन करें |

    देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
    अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥

    यमराज बोले:[हे बालक!] इस प्रश्न का उत्तर तो देवता भी नही जानते | आत्मा बहुत सूक्ष्म होती है और इसको जानना अत्यंत दुर्लभ है | मुझे इसका उत्तर देने के लिए मजबूर मत करो | कोई और वर मांग लो|

    देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ।
    वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥

    नचिकेता ने कहा: [हे देव !] मेरे लिए इससे अधिक मांगने लायक कुछ और नही है, और सिर्फ आप ही हैं जिसको इसका [स्पस्ट] उत्तर दे सकते हैं|
    (यमराज ने नचिकेता को कई प्रकार से समझाने का प्रयास किया, उसे कई प्रकार के प्रलोभन भी दिए)

    शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्।
    भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥

    रामराज बोले: मुझसे सैकड़ों साल की आयु, पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, सोने, जवाहरात मांग लो | पृथ्वी पर विशाल राज्य ले लो| अपने लिए इक्षानुसार आयु मांग लो|

    एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च।
    महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥

    अपनी इक्षानुसार पृथ्वी पर अपार धन, सम्पदा और दीर्घ आयु लेकर जीवन व्यतीत करो| मैं तुम्हे वरदान के रूप में दे दूँगा|

    ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छ्न्दतः प्रार्थयस्व।
    इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः।
    आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥

    कोई भी ऐसी इक्षा जो किसी मनुष्य ने कभी पूरी नही की होगी, वह सब मैं तुम्हे प्रदान करूँगा | सेवक-सेविकाएं, रथ और सारी सुविधाएँ जो किसी मनुष्य ने प्राप्त नही की होंगी| हे नचिकेता यह सब मैं तुम्हे वर के रूप में दे दूँगा परन्तु मृत्यु के बारे में मत पूछो|

    श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः।
    अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥

    नचिकेता ने कहा:[हे देव!] यह सब अल्पकालिक हैं | आज हैं कल नही होंगे | अपने जो कुछ भी देने को कहा वे सब इन्दिर्यों को भर्मित करने वाले हैं | सभी प्रकार के जीवन बहुत छोटे हैंअल्पकालिक हैं| यह सुंदर स्त्रियां, रथ आदि आप रहने दें, मुझे नही चाहिये|


    न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष चेत्त्वा।
    जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वम् वरस्तु मे वरणीयः स एव॥

    मनुष्य का तर्पण(उद्धार) धन से नही हो सकता | धन धान्य तो तभी तक उपयोगी हैं जब तक हम जीवित हैं| आयु कितनी भी लंबी हो जाए फिर भी छोटी ही है | मुझे तो वही वर चाहिये अर्थात मुझे मृत्यु का रहस्य बताएं|

    अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः कधःस्थः प्रजानन्।
    अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदा- नतिदीर्घे जिविते को रमेत ॥

    उस अमरता को जहाँ कुछ भी क्षय नही होता को छोड़कर कौन[बुद्धिमान] होगा जो नाशवान रंग, रूप, भौतिक सुख को लंबे समय के लिए भोगना चाहेगा[यह जानते हुए कि इन सब का अंत होना ही है]

    यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्सांपराये महति ब्रूहि नस्तत्।
    योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥

    हे रामराज ! मुझे उस रहस्य को बताएं की मृत्यु के बाद क्या होता है | इस गुढ़ रहस्य को जानने से गहरी अज्ञानता भी नष्ट होगी| नचिकेता को इसके सिवाय और कोई वर नही चाहिये|

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    नचिकेता का यमराज के साथ यह वार्तालाप लोमहर्षक है| इस कथा का वर्णन महाभारत में भी आता है| मैं भक्तों से निवेदन करूँगा की अपनी तरफ से प्रयास करके इस कथा के बारे में और भी जानकारी प्राप्त करें|
     

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