Teachings from Ramcharitmanas (Tulsi-Ramayan)

Discussion in 'Hindu Holy Books' started by garry420, Dec 28, 2015.

  1. garry420

    garry420 Well-Known Member

    One of the most beautiful and simple scriptures of Sanatan Dharma is Ramcharitmanas. It not only includes the lovely pastimes and acts (leelas) of Lord Rama, but also great teachings to be followed by all, explained in the simplest words.

    Lord's Rama's entire life was an example for future generations to follow, that is why his character was Maryada Purushottam.

    Ramayan was originally composed by Sage Valmiki, and then in Kaliyug, Valmiki was reborn as Tulsidas to re-write Ramayan in the commonly understood language, as sanskrit was not understood by the masses then, and every being has the right to Lord's stories. This Ramayan is also called Tulsi-krit Ramayan or Ramcharitmanas.

    Let us try to share teachings from Ramcharitmanas.

    बालकाण्ड से
    * साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥
    जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥3॥

    भावार्थ:-संतों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपास की डोडी नीरस होती है, संत चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है, कपास उज्ज्वल होता है, संत का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता है, इसलिए वह विशद है और कपास में गुण (तंतु) होते हैं, इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय है।) (जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढँक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता है, उसी प्रकार) संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढँकता है, जिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया है॥3॥
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    Life of saints are auspicious like that of the cotton-plant, whose fruit is tasteless, bright, and has good-qualities. (cotton's stem is tasteless, saints too have no attachment to sensory pleasures hence their life is also devoid of tastes, cotton is white, saint-hearts are also devoid of the darkness of ignorance and sin, hence it is bright or white, cotton has gun (fibers) and saints are also full of gun (goodness)).
    Like cotton thread surrenders its body to cover the hole created by needle, OR
    Like cotton is beaten, stretched and knitted, and suffers so much pain and yet becomes cloth to cover others' bodies, same way saints suffer pain themselves and cover others' faults, and for this reason they are worshiped in the world.

    * मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥
    राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥4॥

    भावार्थ:-संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं॥4॥

    * बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥
    जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥2॥

    भावार्थ:-वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी ने अपने-अपने मुखों से अपनी होनी (जीवन का वृत्तांत) कही है। जल में रहने वाले, जमीन पर चलने वाले और आकाश में विचरने वाले नाना प्रकार के जड़-चेतन जितने जीव इस जगत में हैं॥2॥
    * मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥
    सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥3॥

    भावार्थ:-उनमें से जिसने जिस समय जहाँ कहीं भी जिस किसी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पाई है, सो सब सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिए। वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है॥3॥

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    Company of saints gives bliss and benefits, they are like moving Prayaag (Lord of all Teerthas) in the world, in whom Lord's devotion is Ganges, and propagation of Brahm-knowledge is river Saraswati.

    Valmiki, Narad and Agastya sages have themselves said their own life-stories (ie. all of them benefited only through company of saints), and all beings living in water, land or flying in air that exist in this world, all of them have received whatever benefits, intellect, fame, opulence, and goodness through whatever efforts, all that is the result of Sat-sang (company of saints) alone. There is not other way of benefiting oneself given in the Vedas or in all of the Lokas (worlds).


    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड.3)
    * बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
    सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥4॥

    भावार्थ:-सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल है॥4॥

    * सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥
    बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥5॥

    भावार्थ:-दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुंदर सोना बन जाता है), किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं। (अर्थात्‌ जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।)॥5॥

    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड...3)
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    Without satsang (company of saints), the conscience does not awaken, and that satsang cannot be obtained without the grace of Ram.

    Satsang is the root of bliss and welfare. The attainment of Satsang itself is the ultimate fruit, all other attempts are mere flowers.

    Even the wicked change by obtaining satsang, just like by the touch of philosopher's stone (paaras), iron changes to gold.

    If at anytime by providence divine, good people get into bad company, then even there they, like the snake's crystal, do not give up their good qualities (ie: like despite being in the company of the poisonous snake, the crystal does not give up its light, same way even while being with wicked people, good men give light (benefits) to others, they are unaffected by the evil around them).

    (Shriramcharitmanas, Baalkand -3)


    *भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
    सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥4॥
    गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥5॥

    भावार्थ:-भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुंदर यश और अपयश की सम्पत्ति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गंगाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुग के पापों की नदी अर्थात्‌ कर्मनाशा और हिंसा करने वाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं, किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है॥4-5॥

    * भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
    सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥5॥

    भावार्थ:-भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किए रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में॥5॥

    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड...5)
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    The good and bad receive praise and insult according to their respective deeds.

    Nectar, Moon, Ganges, Sadhu, Poison, Fire, River of Sins of Kaliyug (Karmnasha), Slayer - their good and bad qualities are known by all, and each one likes whatever good/bad qualities that appeal to him.

    The good only adopts the good qualities, and the lowly adopts the bad ones. The praise of nectar is in its quality of giving immortality, and the praise of poison is in killing.

    (Ramcharitmanas, Balkand...5)

    * भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥
    कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥2॥

    भावार्थ:-भले-बुरे सभी ब्रह्मा के पैदा किए हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचार कर वेदों ने उनको अलग-अलग कर दिया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण-अवगुणों से सनी हुई है॥2॥

    * दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥
    दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥3॥
    माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥
    कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥4॥
    सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥5॥

    भावार्थ:-दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊँच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन (सुंदर जीवन)-मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गंगा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य (ये सभी पदार्थ ब्रह्मा की सृष्टि में हैं।) वेद-शास्त्रों ने उनके गुण-दोषों का विभाग कर दिया है॥3-5॥

    दोहा :
    * जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
    संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥

    भावार्थ:-विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किन्तु संत रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं॥6॥

    श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड
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    The good and the bad, all have been created by Brahma only, but the vedas have classified them as good/bad according to the qualities. The Vedas, Puranas and Itihasas declare that the creation of Brahma is full of good and bad qualities.

    All of the following substances are in this creation, vedas and scriptures have broken them up as good and bad - happiness-sorrow, piety-sins, day-night, saint-wicked, demigods-demons, high-low, nectar-poison, maya-brahm, jeeva-God, wealth-poverty, beggar-king, brahmin-butcher, heaven-hell etc.

    Brahma has created this conscious-unconscious world with good and bad qualities, but the Swans (saints) adopt the Milk (good qualities) and leave aside the water (bad ones).
     
  2. garry420

    garry420 Well-Known Member


    * अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥
    काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥1॥

    भावार्थ:-विधाता जब इस प्रकार का (हंस का सा) विवेक देते हैं, तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है। काल स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु) भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं॥1॥

    * सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥
    खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥2॥

    भावार्थ:-भगवान के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं, परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता॥2॥

    (श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड..7)
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    When Brahma gives this kind of conscience (like a swan), then leaving the evils, the mind gets attracted towards goodness.

    Under the strong influence of time, character and karmas, sometimes good people also fail from goodness under the influence of Maya.

    But the devotees of God correct those mistakes of themselves and removing evils, they give pure fame.

    Similarly sometimes the wicked men also, by obtaining good company, do good deeds, but their unbreakable evil nature does not go ever.

    (Ramcharitmanas, Balkand 7)

    * लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
    उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥3॥

    भावार्थ:-जो (वेषधारी) ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधु का सा) वेष बनाए देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है, परन्तु एक न एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ ॥3॥

    * किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
    हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥4॥

    भावार्थ:-बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत में जाम्बवान्‌ और हनुमान्‌जी का हुआ। बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है, यह बात लोक और वेद में है और सभी लोग इसको जानते हैं॥4॥
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    those who are frauds, cheats, even they are worshiped by the world due to their saintly appearance, but some day their fraud surely gets exposed, it doesn't last forever, just like it happened for Raavam, Raahu and Kaalnemi.

    But true saints are respected in the world even despite a bad appearance, like Jaambvan and Hanumanji.

    It is famous in all the 3 worlds and in the Vedas, and everyone knows it that Bad-company causes harm and good-company brings benediction.


    * गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
    साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥5॥

    भावार्थ:-पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले) जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है। साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं॥5॥

    * धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥
    सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥6॥

    भावार्थ:-कुसंग के कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ (सुसंग से) सुंदर स्याही होकर पुराण लिखने के काम में आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवन के संग से बादल होकर जगत को जीवन देने वाला बन जाता है॥6॥
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    Dust, when accompanied by wind, rises to the skies, and that same dust, when accompanies low-flowing water, turns into mud.

    Even parrots and maynahs of a saint's house chant "Ram-Ram", and those of a wicked man's house call abuses.

    Due to bad company, smoke becomes soot, but that same smoke, through good company, turns into beautiful ink and is used for writing puranas, and the same smoke again, when accompanied by water, fire and wind, turns into clouds and provides life to the world.



    दोहा :
    * ग्रह भेजष जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
    होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥7 (क)॥

    भावार्थ:-ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र- ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसार में बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं।
    चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैं॥7 (क)॥

    * सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
    ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥7 (ख)॥

    भावार्थ:-महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है (एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया)। एक को चन्द्रमा का बढ़ाने वाला और दूसरे को उसका घटाने वाला समझकर जगत ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया॥7 (ख)॥

    (श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड)
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    Planets, Medicine, Water, wind and clothes - all of these become good or bad by taking up good/bad company. Only the wise and conscious men can realize this fact.

    The two fortnights (set of 15 days) in a month have equal light and darkness, yet Brahmaa has named them differently (one is named shukla and the other is named krishna/black). One increases the size of moon, and the other decreases the size of moon, considering this quality, the world praises one and despises the other.

    (ShriRamcharitmanas, Balkand)

    *सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥
    तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥1॥

    भावार्थ:-यद्यपि प्रभु श्री रामचन्द्रजी की प्रभुता को सब ऐसी (अकथनीय) ही जानते हैं, तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा। इसमें वेद ने ऐसा कारण बताया है कि भजन का प्रभाव बहुत तरह से कहा गया है। (अर्थात भगवान की महिमा का पूरा वर्णन तो कोई कर नहीं सकता, परन्तु जिससे जितना बन पड़े उतना भगवान का गुणगान करना चाहिए, क्योंकि भगवान के गुणगान रूपी भजन का प्रभाव बहुत ही अनोखा है, उसका नाना प्रकार से शास्त्रों में वर्णन है। थोड़ा सा भी भगवान का भजन मनुष्य को सहज ही भवसागर से तार देता है)॥1॥

    *एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥
    ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥2॥

    भावार्थ:-जो परमेश्वर एक है, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम है और जो सबमें व्यापक एवं विश्व रूप हैं, उन्हीं भगवान ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकार की लीला की है॥2॥

    *सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥
    जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥3॥

    भावार्थ:-वह लीला केवल भक्तों के हित के लिए ही है, क्योंकि भगवान परम कृपालु हैं और शरणागत के बड़े प्रेमी हैं। जिनकी भक्तों पर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिस पर कृपा कर दी, उस पर फिर कभी क्रोध नहीं किया॥3॥

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    Although everyone knows that Lord's glory cannot be expressed in words, yet no one can stop himself from saying it. The reason given in Vedas for this is that the effect of singing his glories are numerous. (ie, none can ever completely describe God's glory, yet one must sing of his qualities as much as possible because such singing has wonderful effects as described in scriptures. Even little bhajan (singing) of his glories can easy help the being cross the ocean of world (ie, get liberated)


    That Supreme God who is one single, who has no desires, who has no form or name, who was never born, who is real, conscious and ocean of bliss, who is the supreme destination of all, and who is present in all and in whose form the entire world is included, that very God has taken up the divine body (Bodies of Lord's incarnations like Ram and Krishna are not material, they are divine) and done various types of Acts.

    Those acts are solely for the benefit of the devotees, because God is supremely gracious/kind and immensely loves his refugees. He bestows immense love and grace on his devotees, he is such that once if he bestows his grace upon someone, then he never gets angry on that person.

    [Sriramcharitmanas, Balkand..13]

    *गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
    बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥4॥

    भावार्थ:-वे प्रभु श्री रघुनाथजी गई हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले, गरीब नवाज (दीनबन्धु), सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान लोग उन श्री हरि का यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम) देने वाली बनाते हैं॥4॥

    *अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
    चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥13॥

    भावार्थ:-जो अत्यन्त बड़ी श्रेष्ठ नदियाँ हैं, यदि राजा उन पर पुल बँधा देता है, तो अत्यन्त छोटी चींटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना ही परिश्रम के पार चली जाती हैं।

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    * कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥

    कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। { श्रीरामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुंदर (सबका अनन्त कल्याण करने वाली ही) है,}
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    Lord Raghunath (Rama) is everyone's master, omni-potent, simple natured, gracious on the poor, and HE makes one obtain back the lost things.

    Considering this, the wise mention the glories of that Shri Hari and make their voice pure and provider of supreme-fruit (Moksha and rare Devotion).

    If the king constructs a bridge on the extremely large and greatest rivers, then even a small ant can walk on it and easily cross over without any effort. (ie: Lord's name is the bridge constructed by Lord over the ocean of material world, and we can cross this ocean effortlessly through HIS name).

    Only that Glory, Poetry and Wealth is best, which benefits everyone like river Ganga. (ie, Lord Ram's glory is beautiful and benefits all.)
     
  3. garry420

    garry420 Well-Known Member

    The GLORY OF RAM'S NAME
    * बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
    बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥

    भावार्थ:-मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात्‌ 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भंडार है॥1॥

    *महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
    महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥2॥

    भावार्थ:-जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है तथा जिसकी महिमा को गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥2॥

    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड.....19)
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    I bow to Lord Ram's Name, which is the cause of Fire, Sun and Moon (ie: it is in the seed form of Ra, Aa, and Ma).

    That Name "Raam" is another form of Brahmaa, Vishnu and Shiva. It is the life of vedas, it is attributeless, peerless, and storehouse of goodqualities.

    The Name is a Mahamantra, which Lord Shiva keeps chanting, and it is the cause of Liberation in Kashi (through updesha of Ram name By shiva in Kashi).

    Lord Ganesha knows the power of Ram Name, through the influence of this Name itself Ganesha is worshiped first of all.

    The Glory of Ram's Name
    * जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
    सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥3॥

    भावार्थ:-आदिकवि श्री वाल्मीकिजी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गए। श्री शिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नाम के समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति (श्री शिवजी) के साथ राम-नाम का जप करती रहती हैं॥3॥

    * हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥
    नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥4॥

    भावार्थ:-नाम के प्रति पार्वतीजी के हृदय की ऐसी प्रीति देखकर श्री शिवजी हर्षित हो गए और उन्होंने स्त्रियों में भूषण रूप (पतिव्रताओं में शिरोमणि) पार्वतीजी को अपना भूषण बना लिया। (अर्थात्‌ उन्हें अपने अंग में धारण करके अर्धांगिनी बना लिया)। नाम के प्रभाव को श्री शिवजी भलीभाँति जानते हैं, जिस (प्रभाव) के कारण कालकूट जहर ने उनको अमृत का फल दिया॥4॥

    दोहा :
    * बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
    राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥19॥

    भावार्थ:-श्री रघुनाथजी की भक्ति वर्षा ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और 'राम' नाम के दो सुंदर अक्षर सावन-भादो के महीने हैं॥19॥

    श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड
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    The Poet Valmikiji knows the power of Ram's name, who chanted it in reverse manner (maraa, maraa) and got purified.

    Hearing Lord Shiva's words that one RAAM name is equal to chanting a 1000 names, Mother Parvati constantly keeps chanting this name along with her husband Shiv ji.

    Seeing such love for Raam-name in Parvati ji's heart, Shiv ji was pleased and adorned the jewel amongst women (Parvati) as the jewel (ornament) of his own body, ie, accepted her as half of his own body (ardh-angini).

    Lord Shiva knows the effect of Ram name very well. Due to chanting this name, Kalkut poison also had the effect of nectar on Shiva ji.

    Lord Ram's devotion is the rainy-season, Tulsidasji says that great servants are like crops and the 2 beautiful letters of "Raa" and "ma" are the 2 months (saavan and bhaado) of rainy season.


    The Glory of Ram's Name
    * आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
    ससुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥1॥

    भावार्थ:-दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देने वाले हैं और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं (अर्थात्‌ भगवान के दिव्य धाम में दिव्य देह से सदा भगवत्सेवा में नियुक्त रखते हैं।)॥1॥

    * कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥
    बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥2॥

    भावार्थ:-ये कहने, सुनने और स्मरण करने में बहुत ही अच्छे (सुंदर और मधुर) हैं, तुलसीदास को तो श्री राम-लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इनका ('र' और 'म' का) अलग-अलग वर्णन करने में प्रीति बिलगाती है (अर्थात बीज मंत्र की दृष्टि से इनके उच्चारण, अर्थ और फल में भिन्नता दिख पड़ती है), परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्म के समान स्वभाव से ही साथ रहने वाले (सदा एक रूप और एक रस),॥2॥
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    Both the letters of name are sweet and enchanting, they are the eyes in the body of alphabets, they are the life of devotees. They are easily available to all for remembering and bestow happiness.

    They provide benefit in this world, and are our caretakers in the worlds beyond this. (ie, They always keep one engaged in Lord's service in HIS divine abode in a Divine body).

    They are too good in uttering, hearing and remembering. To Tulsidas they are as dear as Ram and Laxman themselves.

    Their love is separated if the two letters are mentioned separately (ie, from the view point of seed-letters, there seems to be a difference in their utterance, meaning and fruits) but like Jeeva and Brahm, they always naturally stay together.

    The Glory of Ram's name
    * नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥
    भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥3॥

    भावार्थ:-ये दोनों अक्षर नर-नारायण के समान सुंदर भाई हैं, ये जगत का पालन और विशेष रूप से भक्तों की रक्षा करने वाले हैं। ये भक्ति रूपिणी सुंदर स्त्री के कानों के सुंदर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत के हित के लिए निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं॥3॥

    * स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥
    जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥4॥

    भावार्थ:-ये सुंदर गति (मोक्ष) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, कच्छप और शेषजी के समान पृथ्वी के धारण करने वाले हैं, भक्तों के मन रूपी सुंदर कमल में विहार करने वाले भौंरे के समान हैं और जीभ रूपी यशोदाजी के लिए श्री कृष्ण और बलरामजी के समान (आनंद देने वाले) हैं॥4॥

    दोहा :
    * एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
    तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥20॥

    भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- श्री रघुनाथजी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमें से एक (रकार) छत्ररूप (रेफ र्) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार) रूप से सब अक्षरों के ऊपर है॥20॥

    (बालकाण्ड)
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    These two letters are beautiful brothers like Nar and Narayana. They are the care-takers of the world, and especially protect the devotees.
    They are the beautiful earings of the beautiful lady in the form of Bhakti.
    They are like the pure moon and sun for the benefit of the world.

    They are like satisfaction and like the taste of nectarian Moksha. They support the earth like Sheshnag and the tortoise (who supported the weight of mandarachal parvat while sagar-manthan). They are the bees that roam in the lotus-hearts of devotees, and for mother Yashoda in the form of tongue, they provide bliss like Krishna and Balrama.

    Tulsidasji says - The two letters are extremely beautiful, one (Ra) is the Umbrella and other (Ma) is the Crown-jewel over all other alphabets.

    (Balkand)
     
  4. garry420

    garry420 Well-Known Member

    The Glory of Ram's name
    समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
    नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥1॥

    भावार्थ:-समझने में नाम और नामी दोनों एक से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात्‌ नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्री रामजी अपने 'राम' नाम का ही अनुगमन करते हैं (नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं, ये (भगवान के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुंदर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धि से ही इनका (दिव्य अविनाशी) स्वरूप जानने में आता है॥1॥

    * को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
    देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥2॥

    भावार्थ:-इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता॥2॥
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    Logically the Name and the Named (person who is named ie. God) are same, yet they have a mutual loving relation of servant and master. (ie. Although the Name and Named (god) are completely one, yet just like a servant follows his master everywhere, same way the Named (god) follows his Name everywhere. Lord Shri Ram follows his name (he comes as soon as his name is called). Name and Form, both are attributes of God, both are indescribable, eternal, and only through beautiful (full of pure devotion) intellect can their (divine indestructible) form be known.).

    It would be an offense to say who amongst them (Name and Form) is senior and who is junior. The Sadhu men will themselves understand by listening to the comparison of their (name and form's) qualities. Form is dependent upon name, without Name, the form cannot be known.

    The Glory of Ram's Name
    * रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें॥
    सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥3॥

    भावार्थ:-कोई सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूप के बिना देखे भी नाम का स्मरण किया जाए तो विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में आ जाता है॥3॥

    * नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
    अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥4॥

    भावार्थ:-नाम और रूप की गति की कहानी (विशेषता की कथा) अकथनीय है। वह समझने में सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुंदर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान कराने वाला चतुर दुभाषिया है॥4॥

    दोहा :
    * राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
    तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥21॥

    भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि-दीपक को रख॥21॥
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    Any special form, even if kept right on the palm of hands, cannot be known without knowing its name. And if without even looking at the form the name is remembered, then with special love the form shows itself within the heart.

    The specialities of Name and Form are indescribable. They provide happiness when understood, but they cannot be completely described. Name is the beautiful witness between Nirguna and Saguna, and its the smart transcriber who brings the true realization of both.

    Tulsidasji says that If you want light (knowledge) in both places- within and without, then keep the jewel-lamp of Raam's Name on the divider (tongue) of your door (mouth).


    The Glory of Ram's Name
    श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड ...22
    .
    * नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥
    ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥1॥

    भावार्थ:-ब्रह्मा के बनाए हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान्‌ मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए (तत्व ज्ञान रूपी दिन में) जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं॥1॥

    * जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥
    साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥2॥

    भावार्थ:-जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। (लौकिक सिद्धियों के चाहने वाले अर्थार्थी) साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमादि (आठों) सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं॥2॥
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    The detached Yogis who are well liberated from this world made by Brahmaa, they remain awake (in the daylight of Knowledge) only by chanting this name through their tongues, and experience the Brahm-Bliss that is unequaled and indescribable.

    Those curious men who want to know the deep secret (true glory) of God, they too get to know it by chanting this name through their tongues.

    Strivers (Those who strive for worldly powers) too constantly chant the name and become siddhas upon attaining all the 8 powers (siddhis).

    The Glory of Ram's Name
    * जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
    राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥3॥

    भावार्थ:-(संकट से घबड़ाए हुए) आर्त भक्त नाम जप करते हैं, तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत में चार प्रकार के (1- अर्थार्थी-धनादि की चाह से भजने वाले, 2-आर्त संकट की निवृत्ति के लिए भजने वाले, 3-जिज्ञासु-भगवान को जानने की इच्छा से भजने वाले, 4-ज्ञानी-भगवान को तत्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजने वाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं॥3॥

    * चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥
    चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥4॥

    भावार्थ:-चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है, इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है। इसमें तो (नाम को छोड़कर) दूसरा कोई उपाय ही नहीं है॥4॥
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    If devotees in distress chant the Name, their worst calamities of the gravest type disappear and they become happy.

    In this world there are four kinds of devotees of Shri Rama (worshiping God for acquiring materials, for removing troubles, for realizing god, and gyaanis who love God naturally); all the four of them are virtuous, sinless and noble. All the four, clever as they are, rely upon the Name. Of these the enlightened devotee is specially dear to the Lord.

    The glory of the Name is supreme in all the four Yugas and all the four Vedas, particularly in the Kali age, in which there is no other means of salvation.

    The glory of Rams' name
    दोहा :
    * सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
    नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥22॥

    भावार्थ:-जो सब प्रकार की (भोग और मोक्ष की भी) कामनाओं से रहित और श्री रामभक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुंदर प्रेम रूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है (अर्थात्‌ वे नाम रूपी सुधा का निरंतर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते)॥22॥

    चौपाई :
    * अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
    मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग ‍िनज बस निज बूतें॥1॥

    भावार्थ:-निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है॥1॥
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    People who are devoid of all sorts of desires (of enjoyment or even of Moksha) and who are immersed in the nectar of Lord's-Devotion, even they have made their hearts a fish in the nectarian Lake of beautiful Love for God's Name. (ie, they continuously keep drinking the nectar of Lord's name, they don't want to leave it even for an instant).

    Nirguna and Saguna are the two forms of Brahman. Both of them are indescribable, infinite, beginning-less, and peerless. In my opinion the Name is superior to both of them, which has them under its control through its own power.

    There is a beautiful bhajan by anup jalota on the same theme...

    he sings "ram se bada raam ka naam"




    Lyrics (with translation) of above
    श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं |
    नवकंज लोचन, कंज-मुख, कर-कुंज, पद-कंजारुणं ||

    कंदर्प अगणित अमित छबि, नवनील-नीरद सुन्दरं |
    पट पीत मानहु तडीत रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ||

    भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्य-वंश-निकंदनं |
    रघुनंद आंनदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं ||

    सिर मुकुट कूंडल तिलक चारु उदारु अंग विभुषणं |
    आजानु भुजा शरा चाप धरा, संग्राम जित खर दुषणं ||

    इति वदित तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं |
    मम ह्रदय-कंज-निवास कुरु, कमदि खल दल गंजनं | |

    O my heart! Sing praises of Sri Ram, Who absolves the greatest fears due to the cycle of life and death, and Whose eyes, mouth, hands, and feet are like a newly blooming red lotus

    I bow to Sri Ram, Whose beauty puts to shame even the beauty of innumerable Kamdevas, Whose body is like a newly formed dense blue cloud, Whose yellow robes are shining like lightening (on His cloud like body), Whose beauty is gleaming, and Who is the consort of the daughter of Janak (Sita)


    Sing praises of Sri Ram, Who is the friend of poor, Who is the Lord of Sun-dynasty, Who expurgated the lineage of demons from Danu and Diti, Who is the dear one of Raghus, Who is the root of happiness, Who is like a moon for Kausalya, and Who is dear son of Dashrath

    Sing praises of Sri Ram, Who has a beautiful crown on His head, Who is adorned with ear-hoops, Who has a beautiful colored mark (tilak) on His forehead, Who has expanded and beautiful body-parts decorated by ornaments, Who has long hands reaching His knees, Who holds a bow and an arrow, and Who defeated Khar and Dushan in a fierce battle

    Tulsidas says this; Ram, the enticer of Shiv, Shesh (Sheshnag), and saints, reside in my lotus-like-heart and destroy the evils generated by desire.
     
  5. garry420

    garry420 Well-Known Member

    * प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥
    एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥2॥
    उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥
    ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी॥3॥

    भावार्थ:-सज्जनगण इस बात को मुझ दास की ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मन के विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कहता हूँ। (‍िनर्गुण और सगुण) दोनों प्रकार के ब्रह्म का ज्ञान अग्नि के समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्नि के समान है, जो काठ के अंदर है, परन्तु दिखती नहीं और सगुण उस प्रकट अग्नि के समान है, जो प्रत्यक्ष दिखती है।
    (तत्त्वतः दोनों एक ही हैं, केवल प्रकट-अप्रकट के भेद से भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होने पर भी) दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं। इसी से मैंने नाम को (निर्गुण) ब्रह्म से और (सगुण) राम से बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है, सत्ता, चैतन्य और आनन्द की घन राशि है॥2-3॥

    (> बालकाण्ड...23)
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    The wise men kindly do not consider it as an impudence of this servant (tulsidas), or as a mere poetical expression. I am saying according to the faith, love and interest of my heart. Knowledge of both the forms of Brahman (nirguna and saguna) is like fire.

    Nirguna is like that hidden fire, which resides in the wood, but cannot be seen, and Sagun is like that visible fire, which can be directly seen.

    (In essence, both are one, and due to the mere difference of visible-invisible, they appear to be different. Yet....) It is difficult to know either of them, but through Name, both can easily be known. That is why I have said the Name to be superior even to (Nirguna) Brahman and (Saguna) Raam.

    Brahman is all pervading, ONE, indestructible, Real, Conscious and storehouse of Bliss.

    (Balkand 23)

    The Glory of Ram's Name
    * अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
    नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥4॥

    भावार्थ:-ऐसे विकाररहित प्रभु के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी हैं। नाम का निरूपण करके (नाम के यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभाव को जानकर) नाम का जतन करने से (श्रद्धापूर्वक नाम जप रूपी साधन करने से) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है, जैसे रत्न के जानने से उसका मूल्य॥4॥

    दोहा :
    * निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
    कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥23॥

    भावार्थ:-इस प्रकार निर्गुण से नाम का प्रभाव अत्यंत बड़ा है। अब अपने विचार के अनुसार कहता हूँ, कि नाम (सगुण) राम से भी बड़ा है॥23॥

    > श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड

    These verses and above and succeeding verses are from

    http://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/BalKand/12.htm
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    Despite such a flawless Lord residing in their hearts, all the beings in the world are suffering.

    By knowing the Name (knowings its true form, glory, secret, and effect) and by faithfully chanting the name, that Brahman appears just like the value of a gem-stone appears upon knowing its name.

    This way, the effect of Name is much greater than that of Nirguna Lord. Now I say from my own deliberation that Name is greater than even Saguna Lord (Ram).

    Why Is Lord Rama's Name even Bigger than Lord ?

    * राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥
    नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥1॥

    भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया, परन्तु भक्तगण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज ही में आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं॥1॥।

    * राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
    रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥2॥
    सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
    भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥3॥

    भावार्थ:-श्री रामजी ने एक तपस्वी की स्त्री (अहिल्या) को ही तारा, परन्तु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि को सुधार दिया। श्री रामजी ने ऋषि विश्वामिश्र के हित के लिए एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़का की सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की, परन्तु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओं का इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का। श्री रामजी ने तो स्वयं शिवजी के धनुष को तोड़ा, परन्तु नाम का प्रताप ही संसार के सब भयों का नाश करने वाला है॥2-3॥
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    Lord Shree Rama took up the human for for the benefit of his devotees, and suffering pain himself he gave comfort to the saints. But devotees, merely by chanting his name with Love, easily become the storehouse of Bliss and Benefits.

    Lord Rama freed only one wife of a Tapasvi (Ahilya), but his Name has straightened the evil-minds of millions of wicked men.

    Lord Rama, for the benefit of Rishi Vishwamitra, only killed one daughter (Tadakaa) of Suketu Yaksha along with her army and son (SUbaahu), but his Name kills the flaws, pains and fears of its devotees just like the sun ends the night.

    Lord Rama broke the bow of Lord Shiva, but the glory of HIS name alone can destroy all the fears of this world.

    Why is Lord Ram's Name bigger the HIM ?

    * दंडक बन प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥
    निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥4॥

    भावार्थ:-प्रभु श्री रामजी ने (भयानक) दण्डक वन को सुहावना बनाया, परन्तु नाम ने असंख्य मनुष्यों के मनों को पवित्र कर दिया। श्री रघुनाथजी ने राक्षसों के समूह को मारा, परन्तु नाम तो कलियुग के सारे पापों की जड़ उखाड़ने वाला है॥4॥

    दोहा :
    * सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
    नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥24॥

    भावार्थ:-श्री रघुनाथजी ने तो शबरी, जटायु आदि उत्तम सेवकों को ही मुक्ति दी, परन्तु नाम ने अगनित दुष्टों का उद्धार किया। नाम के गुणों की कथा वेदों में प्रसिद्ध है॥24॥

    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड )
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    Lord Shri Ram made the (terrible) Dandaka Forest beautiful, but his name has beautified (purified) the minds of countless humans. Lord Rama killed the group of Demons, but name uproots all of the sins of kaliyug.

    Lord Ram only liberated his supreme servants such as Shabari, Jataayu etc, but his name has liberated countless wicked people. The story of qualities of Name is famous in the Vedas.

    (Shriramcharitmanas, Balkand)

    Why is Lord Ram's name bigger than HIM ?
    * राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ ॥
    नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥1॥

    भावार्थ:-श्री रामजी ने सुग्रीव और विभीषण दोनों को ही अपनी शरण में रखा, यह सब कोई जानते हैं, परन्तु नाम ने अनेक गरीबों पर कृपा की है। नाम का यह सुंदर विरद लोक और वेद में विशेष रूप से प्रकाशित है॥1॥

    * राम भालु कपि कटुक बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥
    नामु लेत भवसिन्धु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥2॥

    भावार्थ:-श्री रामजी ने तो भालू और बंदरों की सेना बटोरी और समुद्र पर पुल बाँधने के लिए थोड़ा परिश्रम नहीं किया, परन्तु नाम लेते ही संसार समुद्र सूख जाता है। सज्जनगण! मन में विचार कीजिए (कि दोनों में कौन बड़ा है)॥2॥

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    Lord Ram took both Sugreeva and Vibhishana in his refuge, this is known to all, but the Name has bestowed its grace upon many destitutes. This beautiful glory of Name is especially shown in the Vedas and worlds.

    Lord Ram had to gather together an army of bears and monkeys and did not do any little effort (ie: put in lot of effort) in bridging the sea. But just by taking his name, the ocean of material world dries up. Gentlemen! decide in your mind (who is bigger amongst the two).


    Why is Lord Ram's Name bigger than HIM
    * राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा॥
    राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥3॥

    सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥
    फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥4॥

    भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी ने कुटुम्ब सहित रावण को युद्ध में मारा, तब सीता सहित उन्होंने अपने नगर (अयोध्या) में प्रवेश किया। राम राजा हुए, अवध उनकी राजधानी हुई, देवता और मुनि सुंदर वाणी से जिनके गुण गाते हैं, परन्तु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नाम के स्मरण मात्र से बिना परिश्रम मोह की प्रबल सेना को जीतकर प्रेम में मग्न हुए अपने ही सुख में विचरते हैं, नाम के प्रसाद से उन्हें सपने में भी कोई चिन्ता नहीं सताती॥3-4॥

    दोहा :
    * ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
    रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥25॥

    भावार्थ:-इस प्रकार नाम (निर्गुण) ब्रह्म और (सगुण) राम दोनों से बड़ा है। यह वरदान देने वालों को भी वर देने वाला है। श्री शिवजी ने अपने हृदय में यह जानकर ही सौ करोड़ राम चरित्र में से इस 'राम' नाम को (साररूप से चुनकर) ग्रहण किया है॥25॥
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    Lord Ram killed Ravan along with his family in the battle, then he entered into his city Ayodhya along with Sitaji. Ram became kind, Avadh became the capital, whose qualities are sung beautifully by the demigods and Sages.

    But Devotees, merely by lovingly remembering the Name, effortlessly win over the strong army of delusion and, immersed in Love, revel in their own bliss. Due to the blessing of Name, no worries assail them even in their dreams.

    This way Name is superior even to (Nirguna) Brahman and (Saguna) Rama. It gives boon even to those who themselves give boons to others. Knowing this, Lord Shiva accepted this "Raam" name (as the essence of) from the 100 crore charitras (life-stories) of Lord Rama.
     
    Last edited by a moderator: Dec 28, 2015
  6. garry420

    garry420 Well-Known Member

    why is Lord Ram's name bigger than HIM
    * नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥
    सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥1॥

    भावार्थ:-नाम ही के प्रसाद से शिवजी अविनाशी हैं और अमंगल वेष वाले होने पर भी मंगल की राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगी गण नाम के ही प्रसाद से ब्रह्मानन्द को भोगते हैं॥1॥

    *नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥
    नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥2॥

    भावार्थ:-नारदजी ने नाम के प्रताप को जाना है। हरि सारे संसार को प्यारे हैं, (हरि को हर प्यारे हैं) और आप (श्री नारदजी) हरि और हर दोनों को प्रिय हैं। नाम के जपने से प्रभु ने कृपा की, जिससे प्रह्लाद, भक्त शिरोमणि हो गए॥2॥

    * ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥
    सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥3॥

    भावार्थ:-ध्रुवजी ने ग्लानि से (विमाता के वचनों से दुःखी होकर सकाम भाव से) हरि नाम को जपा और उसके प्रताप से अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया। हनुमान्‌जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा है॥3॥
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    Only through the blessings of this Name is Lord Shiva indestructible and is a storehouse of auspiciousness despite his inauspicious adornments.

    Shukadev ji and Sanak etc siddhas, sages, Yogis enjoy the Supreme bliss only through the blessings of this Name.

    Naradji has known the power of Name. Hari is dear to the entire world, [Hara (shiva) is dear to Hari] and Naradji is dear to both Hari and Har.

    Due to chanting of Name Lord bestowed grace upon Prahlada who thus became the crown-jewel amongst all devotees.

    Dhruva chanted Hari Name out of sorrow (pained by step-mother's harsh words he chanted out of desire) and through the power of name he attained the immovable, unequaled position (Dhruva Loka).

    Hanumanji has Lord Rama under his control through the remembrance of the Pious Name.

    Why is Lord Ram's Name bigger than HIM
    * अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
    कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥4॥

    भावार्थ:-नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्री हरि के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, राम भी नाम के गुणों को नहीं गा सकते॥4॥

    दोहा :
    * नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
    जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥26॥

    भावार्थ:-कलियुग में राम का नाम कल्पतरु (मन चाहा पदार्थ देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) है, जिसको स्मरण करने से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥26॥
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    Even the lowly Ajamil, Elephant and a Prostitute got liberated by the effect of Shri Hari's Name.

    How far do I describe the glory of Name, Even Lord Ram himself cannot sing (describe) the qualities of his Name.

    In Kaliyug, Ram's Name is Kalpa-Tree (gives desired objects) and storehouse of benefits (liberation), just by the remembrance of Name, Tulasidas, who is (lowly) like marijuana, became (pious) like Tulsi.

    * चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥
    बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥1॥

    भावार्थ:-(केवल कलियुग की ही बात नहीं है,) चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्यों का फल श्री रामजी में (या राम नाम में) प्रेम होना है॥1॥

    * ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥
    कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥2॥

    भावार्थ:-पहले (सत्य) युग में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान प्रसन्न होते हैं, परन्तु कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥2॥

    * नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
    राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥3॥

    भावार्थ:-ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)॥3॥
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    Its not only a matter of Kaliyuga, in all the 4 Yugas, all the 3 times, and all the 3 worlds, jeevas have chanted this Name and gotten rid of sufferings.

    Vedas, Puranas and Saints, all are of the opinion that the fruit of all pious deeds is attaining Love for Shri Ram (or for HIS name).

    In the First (Sat) yuga, Lord is pleased through meditation, in second (treta) through Sacrifice, in third (Dwapar) through worship. But kaliyug is impure and the root of sins alone, in this Yuga the human-hearts are like a fish in the ocean of Sins (ie. they do not want to separate from sins at all, therefore meditation, sacrifice and worship cannot be done in Kaliyuga).


    In such a terrible (Kaliyuga) time, Name alone is like the Kalpa-tree, which instantly destroys all the worldly troubles upon remembering it.

    In Kaliyuga, this Ram-Name gives desired fruits, it is the supreme benefactor in worlds beyond this, and in this world it is like mother and father (ie, after this world it gives the supreme Abode of God, and in this world it cares and protects for us in all ways like mother and father).


    The Glory of Ram's Name
    * नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
    कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥4॥

    भावार्थ:-कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌जी हैं॥4॥

    दोहा :
    * राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।
    जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥27॥

    भावार्थ:-राम नाम श्री नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करने वाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी दैत्य) को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥27॥
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    In kaliyug, there is neither (good) Karma, nor Devotion, nor knowledge (jnana), Ram Name is the only support.

    To kill the demon kAlnemi in the form of Kaliyuga (storehouse of deceit), Ram's Name itself is the intelligent and capable Lord Hanuman.

    Ram's Name is Lord Narasimha, Kaliyuga is Hiranyakashipu, and devotees who chant this name are Bhakt Prahlada.

    Ram's name will kill the enemy (demon in the form of Kaliyuga) of demigods, and will thus protect the devotees who chant it.


    The Glory of Lord Ram's Name
    चौपाई :
    * भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

    भावार्थ:-अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है।

    दोहा :
    * जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।
    तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥

    भावार्थ:-जिनके पास श्रद्धा रूपी राह खर्च नहीं है और संतों का साथ नहीं है और जिनको श्री रघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिए यह मानस अत्यंत ही अगम है। (अर्थात्‌ श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेम के बिना कोई इसको नहीं पा सकता)॥
    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड....38)
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    Whether one chants the name with good feeling (love), with bad feeling (hatred), with anger, with laziness, no matter with what feeling one chants, just by chanting the name there is Benefit from all 10 directions.

    Those who do not have the trip-fare of Faith, those who do not have company of saints and those to whom Lord Raghunath is not dear, for those people this Maanas (Ramcharitmanas) is extremely inaccessible. (ie. no one can attain this maanas without faith, satsang and devotion).

    (Balkand 38)

    ALWAYS REMEMBER
    * होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

    जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे।

    (> बालकाण्ड....52)
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    Only that happens which Lord Ram has designed. Then why should one argue and brood over things.


    * जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
    बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥57 ख॥

    भावार्थ:-प्रीति की सुंदर रीति देखिए कि जल भी (दूध के साथ मिलकर) दूध के समान भाव बिकता है, परन्तु फिर कपट रूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद (प्रेम) जाता रहता है॥57 (ख)॥

    * जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥
    तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥3॥

    भावार्थ:-यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता॥3॥

    (> श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड...62)
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    Just see the beautiful tradition of Love, even water (when mixed with milk) sells at the same price as milk, but when the sourness of deception is added, the water instantly separates (milk curdles) and the taste (Love) remains behind. (57 b)

    Although there is no doubt in it that one can go to the house of friend/master/father/Guru without invitation, yet one does not face good results upon going to the house of a person who is against you.

    (Balkand 62)
     
  7. garry420

    garry420 Well-Known Member

    The Glory of ShreeRamCharitManas
    इसका नाम रामचरित मानस है, जिसके कानों से सुनते ही शांति मिलती है।

    मन रूपी हाथी विषय रूपी दावानल में जल रहा है, वह यदि इस रामचरित मानस रूपी सरोवर में आ पड़े तो सुखी हो जाए॥

    यह रामचरित मानस मुनियों का प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानस की शिवजी ने रचना की।

    यह तीनों प्रकार के दोषों, दुःखों और दरिद्रता को तथा कलियुग की कुचालों और सब पापों का नाश करने वाला है॥

    श्री महादेवजी ने इसको रचकर अपने मन में रखा था और सुअवसर पाकर पार्वतीजी से कहा। इसी से शिवजी ने इसको अपने हृदय में देखकर और प्रसन्न होकर इसका सुंदर 'रामचरित मानस' नाम रखा॥

    (श्री शिवजी की कृपा से तुलसीदास जी के हृदय में सुंदर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे वे श्री रामचरित मानस के कवि हुये ।)
    > श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड..35/36
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    This is named RamcharitManas, which instantly gives peace upon hearing through the ears.

    The Elephant (Mind) is burning in the forest-fire (Sense-objects). If it comes and immerses into this Lake (ramcharitmanas), it will get comforted.

    This Manas is dear to the Sages. Lord Shiva created this pleasing and pious Maanas.

    This destroys the three types of flaws, sorrows and poverty, and all the sins and wrongs of Kaliyuga.

    Lord Mahadeva had created it and had preserved it in his heart and narrated it to Parvati ji upon finding a suitable time, Therefore Lord Shiva, seeing it in his heart and being pleased, kept the beautiful name Ramcharit Manas.

    (By the Grace of Lord Shiva, beautiful intellect developed in Tulsidas's heart, through which he became the poet of RAmcharitmanas.

    (Maanas, Balkand 35/36)

    difference between Jeeva (soul) and God
    * सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥
    सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥1॥

    भावार्थ:-गंगा जल से भी बनाई हुई मदिरा को जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गंगाजी में मिल जाने पर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद है॥1॥

    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड...70)
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    Saints, even upon knowing that alcohol has been prepared using Ganga water, do not drink it.

    But just like that very alcohol gets purified upon mixing into the river Ganges, same way is the difference between Jeeva and God.

    (ie. although Jeeva is a fragment of God, Jeeva itself cannot get the status of God).

    Importance of Guru's words

    गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥

    जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी सुगम नहीं होती॥

    > बालकाण्ड....80

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    For him who does not have faith in Guru's words, even in his dreams, happiness and success are not easily accessible.


    Lord Shiva and Ram
    *पराधीन सपनेहूँ सुखु नाहीं॥

    पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता।

    (....102)
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    *सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥
    बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥3॥

    भावार्थ:-शिवजी के चरण कमलों में जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्री रामचन्द्रजी को स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ श्री शिवजी के चरणों में निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्त का लक्षण है॥3॥

    (....104)
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    One who is dependent upon others, he doesn't get happiness even in dreams. (102)

    Those who don't have devotion for the lotus-feet of Lord Shiva, they are not dear to Lord Rama even in HIS dreams.

    Pure love for the feet of the Lord of the Universe, Shiva, itself is the sign of a Rama-devotee. (104)

    Analogies for a body devoid of devotion
    * नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥
    तेसिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥2॥

    भावार्थ:-जिन्होंने अपने नेत्रों से संतों के दर्शन नहीं किए, उनके वे नेत्र मोर के पंखों पर दिखने वाली नकली आँखों की गिनती में हैं। वे सिर कड़वी तूँबी के समान हैं, जो श्री हरि और गुरु के चरणतल पर नहीं झुकते॥2॥

    * जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी॥
    जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥3॥

    भावार्थ:-जिन्होंने भगवान की भक्ति को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया, वे प्राणी जीते हुए ही मुर्दे के समान हैं, जो जीभ श्री रामचन्द्रजी के गुणों का गान नहीं करती, वह मेंढक की जीभ के समान है॥3॥

    * कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥
    भावार्थ:-वह हृदय वज्र के समान कड़ा और निष्ठुर है, जो भगवान के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता।

    ( श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड....113)
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    Those who have never beheld saints, their eyes are in the same count as the false eyes (marks) on the peacock's tail.

    Those heads that do not bow at the soles of Shri Hari and of Guru are no better than bitter pumpkin.

    Those who have never cherished Devotion to Lord in their hearts, those beings are equal to a corpse even while alive.

    A tongue that does not sing the praises of Lord Shri Ram, its equal to the tongue of a frog.

    A heart that does not rejoice upon hearing the tales of Lord is as hard and cruel as a thunderbolt.

    description of deluded souls
    * जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥
    हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥3॥

    भावार्थ:-जिनको निर्गुण-सगुण का कुछ भी विवेक नहीं है, जो अनेक मनगढ़ंत बातें बका करते हैं, जो श्री हरि की माया के वश में होकर जगत में (जन्म-मृत्यु के चक्र में) भ्रमते फिरते हैं, उनके लिए कुछ भी कह डालना असंभव नहीं है॥3॥

    * बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे॥
    जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना॥4॥

    भावार्थ:-जिन्हें वायु का रोग (सन्निपात, उन्माद आदि) हो गया हो, जो भूत के वश हो गए हैं और जो नशे में चूर हैं, ऐसे लोग विचारकर वचन नहीं बोलते। जिन्होंने महामोह रूपी मदिरा पी रखी है, उनके कहने पर कान नहीं देना चाहिए॥4॥

    :: श्रीरामचरितमानस > बालकाण्ड....115
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    Those who have no knowledge either of the absolute (unqualified) Brahman or of the qualified Divinity, who indulge in fanciful talks of various kinds and who wander in the world remaining deluded by Lord Hari's Maya, for them, no assertion is too absurd to make.

    Those who are delirious or mad, those who are possessed and those who are inebriated, they do not talk sense. One should not pay heed to the ravings of those have drunk the wine of infatuation.

    Balkand 115
     
  8. garry420

    garry420 Well-Known Member

    * सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥
    अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥1॥

    भावार्थ:-सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है- मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है॥1॥

    * जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥
    जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥2॥

    भावार्थ:-जो निर्गुण है वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओले में भेद नहीं। (दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं।) जिसका नाम भ्रम रूपी अंधकार के मिटाने के लिए सूर्य है, उसके लिए मोह का प्रसंग भी कैसे कहा जा सकता है?॥2॥
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    There is no difference in Saguna and Nirguna - even the sages, Puranas, Wise men and Vedas say so. That which is Nirguna, formless, unmanifest, and unborn, that itself turns to Saguna under the power of Love of devotees.

    How is the Nirguna itself Saguna? Just like there is no difference in water and hail-stone, (both are water, same way Nirguna and saguna are one and same).

    Whose name is like a Sun for removing the darkness of delusion, how can even a story of delusion be said about him?


    * राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥
    सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥3॥

    भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्य हैं। वहाँ मोह रूपी रात्रि का लवलेश भी नहीं है। वे स्वभाव से ही प्रकाश रूप और (षडैश्वर्ययुक्त) भगवान है, वहाँ तो विज्ञान रूपी प्रातःकाल भी नहीं होता (अज्ञान रूपी रात्रि हो तब तो विज्ञान रूपी प्रातःकाल हो, भगवान तो नित्य ज्ञान स्वरूप हैं।)॥3॥

    * हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥
    राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना॥4॥

    भावार्थ:-हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान- ये सब जीव के धर्म हैं। श्री रामचन्द्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परात्पर प्रभु और पुराण पुरुष हैं। इस बात को सारा जगत जानता है॥4॥
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    Lord Ram is a Sun in the form of Truth+Consciousness+Bliss. There is not even an minute fragment of the darkness of delusion there.

    By HIS very nature HE is Effulgence itself and HE is the Lord (equipped with all the glories), there is not even a dawn of understanding in HIM. (Dawn of understanding can happen only there where there is the darkness of ignorance, but Lord is the constant Jnana itself).

    Joy, Sorrow, knowledge, ignorance, ego (I-ness), and pride - all these are the characteristics of the Jeeva. Shree Ramchandra is the all pervading Brahman, Supreme bliss personified, highest Lord and the most ancient being, the whole world knows it.

    *निज भ्रम नहीं समुझहिं अज्ञानी, प्रभु पर मोह धरहीं जड़ प्रानी
    जथा गगन घन पटल निहारी, झाँपेउ भानु कहहीं कुबिचारी

    अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रम को तो समझते नहीं, और वे मूर्ख प्रभु श्री रामचन्द्रजी पर उसका आरोप करते हैं. लगता है, जैसे आकाश में बादलों का परदा देखकर कुविचारी लोग यह कहते हैं की बादलो ने सूर्या को ढक लिया है.

    *चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥
    उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥2॥

    भावार्थ:-जो मनुष्य आँख में अँगुली लगाकर देखता है, उसके लिए तो दो चन्द्रमा प्रकट (प्रत्यक्ष) हैं। हे पार्वती! श्री रामचन्द्रजी के विषय में इस प्रकार मोह की कल्पना करना वैसा ही है, जैसा आकाश में अंधकार, धुएँ और धूल का सोहना (दिखना)। (आकाश जैसे निर्मल और निर्लेप है, उसको कोई मलिन या स्पर्श नहीं कर सकता, इसी प्रकार भगवान श्री रामचन्द्रजी नित्य निर्मल और निर्लेप हैं।) ॥2॥

    * बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥
    सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥3॥

    भावार्थ:-विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीवात्मा- ये सब एक की सहायता से एक चेतन होते हैं। (अर्थात विषयों का प्रकाश इन्द्रियों से, इन्द्रियों का इन्द्रियों के देवताओं से और इन्द्रिय देवताओं का चेतन जीवात्मा से प्रकाश होता है।) इन सबका जो परम प्रकाशक है (अर्थात जिससे इन सबका प्रकाश होता है), वही अनादि ब्रह्म अयोध्या नरेश श्री रामचन्द्रजी हैं॥3॥
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    Fools do not perceive their own ignorance, instead those stupids attribute delusion to the Lord, just like on seeing the sky covered with clouds, men of unsound judgement declare that the sun has been covered by clouds.

    To him, who sees with a finger stuck in his eye, the moon verily appears as doubled. Uma, delusion is attributed in the same way to Ram as darkness, smoke, or dust appear to be in the sky. (just like sky is pure and unaffected, no one can touch or dirty it, same way Lord Ram is constantly pure and unaffected).


    Sense-objects, senses, and their presiding deities as well as the jeeva- all derive their illumination from the other (ie, objects are illuminated by the senses, senses are illuminated by their presiding deities, and the deities are illuminated by the conscious self).
    The supreme Illuminator of them all is the eternal Rama, King of Ayodhya. The world of matter is the object of illumination, while Rama is its illuminator. He is the Lord of Maya and the abode of wisdom and virtues. It is due to his reality that even unconscious matter appears as real through ignorance.

    The Delusion of Maya
    * जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥
    जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥4॥

    भावार्थ:-यह जगत प्रकाश्य है और श्री रामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं। वे माया के स्वामी और ज्ञान तथा गुणों के धाम हैं। जिनकी सत्ता से, मोह की सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य सी भासित होती है॥4॥

    दोहा :
    *रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि।
    जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि॥117॥

    भावार्थ:-जैसे सीप में चाँदी की और सूर्य की किरणों में पानी की (बिना हुए भी) प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में झूठ है, तथापि इस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता॥117॥
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    This world is the illuminated object, and its illuminator is Lord Ram. He is the Master of Maya and the home of Jnana (knowledge) and qualities.

    Through HIS authority, even the Jada (material or lacking-consciousness) Maya appears to be true with the help of delusion.

    Just like silver appears to be in Oyster-shell and water appears to be in sun-rays though they are not actually present, similarly although such appearance (of maya) is false in all the 3 times, yet no one can remove this delusion.

    * एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥
    जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥1॥

    भावार्थ:-इसी तरह यह संसार भगवान के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है, जिस तरह स्वप्न में कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता॥1॥

    * जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई॥
    आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा॥2॥

    भावार्थ:-हे पार्वती! जिनकी कृपा से इस प्रकार का भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्री रघुनाथजी हैं। जिनका आदि और अंत किसी ने नहीं (जान) पाया। वेदों ने अपनी बुद्धि से अनुमान करके इस प्रकार (नीचे लिखे अनुसार) गाया है-॥2॥

    * बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
    आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥3॥

    भावार्थ:-वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिव्हा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना ही वाणी के बहुत योग्य वक्ता है॥3॥
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    In this way the world is dependent upon Lord. Although it (world) is false, yet it does give pains, just like while dreaming if someone cuts off our head, then that pain doesn't go unless one wakes up.

    Oh parvati! Through WHOSE grace this type of delusion gets removed, that very gracious entity is Lord Ram. WHOse beginning and end has not been obtained (known) by anyone. Vedas, according to their own understanding, have spoken in this (following) way -

    THAT (BRAHMAN) walks without legs, hears without ears, performs various tasks without hands, enjoys all the (six) types of tastes without tongue, and without voice is a very qualified speaker.
     
  9. garry420

    garry420 Well-Known Member

    * तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥
    असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥4॥

    भावार्थ:-वह बिना ही शरीर (त्वचा) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखों के देखता है और बिना ही नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती॥4॥

    दोहा :
    * जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।
    सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान॥118॥

    भावार्थ:-जिसका वेद और पंडित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथनंदन, भक्तों के हितकारी, अयोध्या के स्वामी भगवान श्री रामचन्द्रजी हैं॥118॥
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    He feels/touches without a body (skin), sees without eyes and smells without nose. The deeds of that Brahman are so divine in all ways that its glory cannot be described.

    WHO is thus described by the Vedas and the wise men, and WHOM the sages meditate upon, that very is the son of Dashrath, benefactor of devotees, Lord of Ayodhya, Shri Ramchandra.

    * सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
    अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥140॥

    भावार्थ:-देवता, मनुष्य और मुनियों में ऐसा कोई नहीं है, जिसे भगवान की महान बलवती माया मोहित न कर दे। मन में ऐसा विचारकर उस महामाया के स्वामी (प्रेरक) श्री भगवान का भजन करना चाहिए॥140॥

    * तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥

    भावार्थ:-इसी से तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिंचन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान को प्रिय होते हैं।
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    There is none amongst the demi-gods, humans, and sages whom the great powerful Maya of God does not delude. Thus thinking, one should worship God, the Master (inspirer) of that Great Maya.

    The Saints and the Vedas call out and say that complete paupers (completely devoid of pride, attachment and ego) alone are dear to God.

    * रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
    अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥170॥

    भावार्थ:-तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो भी उसे छोटा नहीं समझना चाहिए। जिसका सिर मात्र बचा था, वह राहु आज तक सूर्य-चन्द्रमा को दुःख देता है॥170॥

    भरद्वाज सुनु जाहि जब होई बिधाता बाम।
    धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥175॥

    भावार्थ:-(याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) हे भरद्वाज! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिए धूल सुमेरु पर्वत के समान (भारी और कुचल डालने वाली), पिता यम के समान (कालरूप) और रस्सी साँप के समान (काट खाने वाली) हो जाती है॥175॥

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    One should not consider a powerful enemy insignificant, even if he is alone. The Raahu, whose merely head survived, is tormenting sun and moon till date.

    Yagyavalk says - Oh Bharadwaj! listen. When God becomes opposing for someone, then for that person, even dust seems like Mountain (heavy and crushing), father seems like lord of death (yamraj), and a rope seems to be snake.

    * जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥

    भावार्थ:-जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ (उसके लिए) सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं।
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    * हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
    देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥3॥

    भावार्थ:-मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान सब जगह समान रूप से व्यापक हैं, प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं, देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों॥3॥

    * अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥

    भावार्थ:-वे चराचरमय (चराचर में व्याप्त) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है), वे प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि। (अग्नि अव्यक्त रूप से सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिए अरणिमन्थनादि साधन किए जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है। इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान भी प्रेम से प्रकट होते हैं।) (187)
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    The kind of devotion and Love that one has in his heart, there (for him) Lord always appears in that way only.

    I simply know that God is present equally everywhere, and he appears through Love.
    Tell me - place, time, direction, where is that point where God is not present?

    He is present in the moving and stationary and yet is he devoid of all and is detached (he is not attached to anything). He appears through love, just like Fire. (fire is invisibly present everywhere, but wherever an attempt, such as rubbing stones or sticks etc, is made for fire, there it appears. Same way, God is present everywhere and appears through Love).

    *अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
    तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥211॥

    भावार्थ:-प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥211॥

    * मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
    महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥256॥

    भावार्थ:-जिसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता हैं, वह मंत्र अत्यन्त छोटा होता है। महान मतवाले गजराज को छोटा सा अंकुश वश में कर लेता है॥256॥

    *तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥
    का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥


    भावार्थ:-यदि प्यासा आदमी पानी के बिना शरीर छोड़ दे, तो उसके मर जाने पर अमृत का तालाब भी क्या करेगा?
    सारी खेती के सूख जाने पर वर्षा किस काम की? समय बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ?
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    Lord Shri Ram is the friend of the miserable, and he bestows his mercy without any reason. Tulsidas says - O wicked (mind)! you leave all tangles of wickedness and worship HIM alone.

    Even Bramhaa, Vishnu, Shiva and all demigods are under the whose control, that Mantra (RAAM) is extremely small. A tiny goad empowers even the mightiest and most furious elephant.

    If a thirsty man dies for want of water, of what avail is a lake of nectar after death? What good is a shower when the whole crop is dried up, what use repenting over an opportunity lost?

    Download pdf of RAmcharitmanas with English translations, use -http://gitapress.org/BOOKS/1318/1318_Sri Ramchritmanas_Roman.pdf
     

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